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PAK में ‘जहरीली हवा’ में सांस लेने को मजबूर लोग, दुनिया का दूसरा सबसे प्रदूषित देश

कंगाल पाकिस्तान (Pakistan) में सिर्फ जनता महंगाई और बेरोजगारी से ही बेहाल नहीं है, बल्कि उसे ‘जहरीली हवा’ में सांस लेने पर भी मजबूर होना पड़ रहा है. IQAir ग्लोबल एयर क्वालिटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान दुनिया का दूसरा सबसे प्रदूषित देश (Polluted Country) है. पाकिस्तानी न्यूज एजेंसी समा टीवी के मुताबिक, पिछले साल पाकिस्तान में PM 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा बताए गए वायु गुणवत्ता स्तर से पांच गुना अधिक था.

पाकिस्तान में पार्टिकुलेट मैटर 59 है, जो अस्वस्थ श्रेणी में है. ये WHO द्वारा बताए गए स्तर 10 मीटर प्रति घन से पांच गुना अधिक है. ‘वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट 2020’ के मुताबिक, पाकिस्तान में रिकॉर्ड की गई एयर क्वालिटी बेहद ही खराब स्तर की है. देश के कई बड़े शहर बड़ी मात्रा में धुआं, धुंध और घातक स्मॉग पैदा कर रहे हैं, जो साफ हवा को दूषित करने में लगे हुए हैं. पाकिस्तान का सबसे साफ शहर राजधानी इस्लामाबाद है, जहां AQI 110 है.

20 फीसदी मौतों का संबंध वायु प्रदूषण से

समा टीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, देश का सबसे प्रदूषित शहर पंजाब प्रांत का लाहौर है, जहां AQI 163 रहा है. कुल मिलाकर लाहौर दुनिया का 18वां सबसे प्रदूषित शहर है. IQAir ने बताया कि पाकिस्तान में होने वाली 20 फीसदी मौतों का संबंध वायु प्रदूषण से है. विशेषज्ञों का कहना है कि देश की प्रदूषित हवा अस्थमा वाले लोगों के लिए घातक हो सकती है और इसके परिणामस्वरूप स्वस्थ बच्चों में भी बीमारी विकसित हो सकती है.

इन वजहों से होता है पाकिस्तान में प्रदूषण

पाकिस्तान में वायु प्रदूषण के लिए कुछ प्रमुख चीजें जिम्मेदार हैं. इसमें वाहनों से निकलना वाला धुंआ और सड़कों पर फैली धूल है. जहां भारत में सड़कों पर से धूल हटाने के लिए पानी का छिड़काव किया जाता है, वहीं पाकिस्तान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. दूसरी ओर कारखानों से निकलने वाला जहरीला धुंआ और खेतों को जलाने से भी पाकिस्तान में बड़ी मात्रा में जहरीला धुंआ पैदा होता है, जो लोगों की मौत की वजह बन रहा है.

कोरोना में हुई मौतों का संबंध भी वायु प्रदूषण से

हालांकि, कोरोनावायरस (Coronavirus) महामारी के चलते हवा में थोड़ा बहुत सुधार जरूर हुआ है. लेकिन ज्यादा फायदा होता नजर नहीं आ रहा है. एक अन्य अध्ययन में बताया गया कि दुनियाभर में कोरोना से हुई मौतों में से सात से 33 फीसदी लंबे समय से वायु प्रदूषण के चलते बीमार रहने वाले लोगों की हुई हैं. यदि हवा की गुणवत्ता में सुधार किया गया होता तो मृतकों की संख्या में गिरावट हो सकती थी.

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