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सरकार ने लिया सबको टीका लगाने का संकल्प: नए साल का नया टीका

नया साल आ गया है। साथ में नए संकल्प भी। जिसे देखो वही एक-दो संकल्प उठाए घूम रहा है। नए साल में कठिन से कठिन संकल्प लिए जाते हैं ताकि उनके पूरा न होने पर कम से कम ग्लानि का अनुभव हो। ढके-छुपे चेहरों से वैसे ग्लानि का कोई भाव दिखता भी नहीं। देखिए एक छोटा-सा मास्क हमें कितनी बड़ी शर्मिंदगी से बचा सकता है! अभी तो यही लग रहा है कि पिछले साल की यह ‘भेंट’ लंबे समय तक हमारे साथ रहने वाली है। साल बदलने भर से हाल बदलने वाला नहीं है। हमारी तरह वायरस ने भी कुछ संकल्प ले रखे हैं। इसकी आदत आदमी-सी है। जब आदमी आसानी से नहीं सुधरता तो हम इस न दिखने वाले वायरस से सुधरने की उम्मीद क्यों रखें? सुनते हैं नया वाला और भी तेज रफ्तार है। अंग्र्रेजी भी है। जाहिर है, हम भारतीय ‘चीनी माल’ की तरह इसे भी खूब प्यार देंगे। पिछले साल से अधिक आपस में बांटेंगे। फैलाने से केवल प्यार ही नहीं वायरस भी फैलता है। सामान्य भारतीय का यही संकल्प है।

वर्ष की शुरुआत नए संकल्पों से लैस, साल पूरा होते ही सारे संकल्प स्वत: ‘एक्सपायर’ हो जाते हैं

रही बात आम आदमी की, संकल्प ले-लेकर वह इतना ‘संकल्पखोर’ बन गया है कि ग्लानि-व्लानि जैसी दुर्बलताएं अब उसके ‘मनोरथ’ में बाधा नहीं बनतीं। ऐसा मनुष्य बड़ा मजबूत हो जाता है। वर्ष की शुरुआत में वह नए संकल्पों से लैस होता है, पर साल पूरा होने से पहले उसके सारे संकल्प स्वत: ‘एक्सपायर’ हो जाते हैं। इससे यह फायदा होता है कि नए संकल्पों के लिए उसकी आत्मा में पर्याप्त जगह बन जाती है। वह फिर से नए संकल्पों की सूची बनाने लगता है। नया साल इसके लिए पर्याप्त माहौल बनाता है। संकल्प भी कई ‘टाइप’ के होते हैं। अधिकतर केवल लेने के लिए होते हैं। उत्तम संकल्प वही माना जाता है जो अपनी मौत मरे। संकल्पबद्ध व्यक्ति ऐसे ‘आत्म-बलिदान’ के लिए हमेशा प्रस्तुत रहता है। जिस प्रकार फल की चिंता किए बिना हमें कर्म करने का अधिकार है, उसी प्रकार संकल्प पूरा होने की चिंता किए बिना हमें निरंतर संकल्प लेते रहना चाहिए। इससे जीवन में रस बना रहता है।

राजनीतिक-किस्म का संकल्प आम आदमी पर सीधा असर डालता

ये संकल्प यूं ही नहीं लिए जाते। इन्हें सार्वजनिक रूप से लिया जाता है। फेसबुक-ट्विटर-इंस्टा और पब्लिक में प्रचारित किया जाता है। ‘अघोषित संकल्प’ का फल सुखदायी नहीं माना जाता। कोई व्यक्तिगत संकल्प लेता है तो कोई राजनीतिक या साहित्यिक। राजनीतिक-किस्म का संकल्प आम आदमी पर सीधा असर डालता है। जिन मनुष्यों ने जनसेवा करने का संकल्प ले रखा है, वे समय-समय पर इसे ‘रीचार्ज’ करते रहते हैं। देश और जनता के लिए निष्ठा और सिद्धांत को अपने ‘दृढ़ संकल्प’ के आगे कभी आड़े नहीं आने देते। इन संकल्पों की विशेषता होती है कि पूरा न होने पर ये स्वत: ‘आउटडेटेड’ हो जाते हैं। इन्हें पूरा करने की न तो जवाबदेही होती है और न ही मजबूरी। पिछले संकल्प उसी तरह भुला दिए जाते हैं जैसे नए चुनाव से पहले पुराने वादे। जो वादे जितने बड़े संकल्प के साथ किए जाते हैं, उनके पूरा होने की ‘आशंका’ उतनी ही कम होती है। जनसेवक की मुख्य चिंता यह होती है कि यदि किया गया वादा गलती से पूरा हो गया तो आगे वे किस बात का संकल्प लेंगे। इसलिए हमेशा नए और मौलिक संकल्प लिए जाते हैं।

साहित्यिक संकल्प लेना सबसे आसान

साहित्यिक संकल्प लेना सबसे आसान है। अमूमन ये अपना ‘टार्गेट’ पूरा कर लेते हैं। इसके लिए बस मनुष्य को कल्पनाशील होना पड़ता है। वह अचानक एक दिन साहित्यकार बन बैठता है। एक ओर वह दिए हुए सम्मान को वापस लौटाने का संकल्प लेता है तो दूसरी ओर अकादमी के नए अध्यक्ष को शुभकामनाएं भेजने लगता है। एक अनुभवी और संकल्पशील साहित्यकार के लिए अब कुछ भी असंभव नहीं रहा। श्रेष्ठ कवि या प्रख्यात कहानीकार न बन पाने पर वह ‘अद्भुत व्यंग्यकार’ बनने का संकल्प ले लेता है।

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