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यह बच्चों पर अत्याचार:‘डॉ. गूगल’ पर लक्षण पढ़ बच्चों को बीमार बता रहे पेरेंट्स, डॉक्टर को भरोसे में ले लेते हैं; विशेषज्ञों ने चेताया

ब्रिटेन में बच्चों के डॉक्टर खासे परेशान हैं। पेरेंट्स बच्चों में तरह-तरह की बीमारियाें के लक्षण बताकर उनके पास ला रहे हैं। डॉक्टर चेक करते हैं, तो कोई बीमारी नहीं निकलती। पेरेंट्स डॉक्टरों को बताने की कोशिश करते हैं कि बच्चे को बीमारी है।

कई बार वे समझाने में सफल भी हो जाते हैं। ऐसे वाकिए बार-बार हो रहे हैं। स्थिति यह हो गई कि रॉयल कॉलेज ऑफ पीडियाट्रिक्स एंड चाइल्ड हेल्थ (आरसीपीसीएच) को डॉक्टरों के लिए दिशा-निर्देश जारी करना पड़ा है।

दरअसल, बच्चों की सेहत में थोड़ा भी बदलाव होने पर पेरेंट्स ‘डॉ. गूगल’ यानी गूगल पर लक्षण सर्च करने लगते हैं। लक्षणों में मिलान होते ही वे मनगढ़ंत बीमारी तय कर लेते हैं और गलतफहमी पाल लेते हैं। आरसीपीसीएच ने इसे जोखिमभरा बताते हुए डॉक्टरों को कहा है कि वे मनगढ़ंत या अनुमान के आधार पर बताई बीमारी की जगह असल लक्षणों का ही इलाज करें।

बच्चों को तात्कालिक रूप से कोई जोखिम न हो तो बच्चों से बात करें। पेरेंट्स से भी अलग से बात करें। पिछले दो साल में यह प्रवृत्ति बढ़ी है। यूके में 4000 कंसल्टेंट पीडिट्रिशन है और पिछले 2 साल में हर डॉक्टर के पास ऐसे केस पहुंचे हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि पेरेंट्स की यह चिंता वाजिब है, लेकिन ऐसे केस में बढ़ोतरी ऑनलाइन मिलने वाली गलत जानकारी के चलते हो रही है। चाइल्ड प्रोटेक्शन विशेषज्ञ डॉ. दान्या ग्लैसर के मुताबिक, यदि पेरेंट्स अपने बच्चों के प्रति चिंतित हैं, तो आपको वास्तव में बच्चों पर ध्यान देना होगा और यह पता लगाना होगा कि उनकी चिंता बेवजह न हो।

आरसीपीसीएच में असिस्टेंट ऑफिसर और कंसल्टेंट पीडिट्रिशन डॉ. एमिलिया वावरजविक कहती हैं, ‘यूके में 216 पीडिट्रिशन पर किए गए सर्वे में 92% ने कहा कि वे ऐसे केस का सामना कर रहे हैं।’ कंसल्टेंट पीडिट्रिशन डॉ. एलिसन स्टीली कहती हैं, ‘सोशल मीडिया पर गैर प्रमाणित स्रोत से लिए आर्टिकल के कारण ऐसी स्थिति बन रही है।

बच्चों के सिर तक मुंडवा रहे पैरेंट्स, बच्चे भी मानने लगते हैं कि वे बीमार हैं

स्थिति यहां तक बिगड़ गई है कि कई पैरेंट्स बच्चों के स्कूल छुड़वा रहे हैं। गैर जरूरी टेस्ट करवा लेते हैं। बच्चों के सिर मुंडवा रहे हैं, ताकि लगे कि कीमोथेरेपी चल रही है। एक डॉक्टर मना कर देता है तो वे दूसरे डॉक्टर के पास जाते हैं। बच्चों को अलग-थलग कर देते हैं। ऐसे में बच्चे मानने लगते हैं कि वे बीमार हैं।

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