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वीजा पॉलिसी पर पेंच:बाइडेन ने एच-1बी वीजा के बैन को खत्म करने पर अब तक नहीं किया फैसला, 31 मार्च तक इस पर बैन है

इलेक्शन कैम्पेन के दौरान H-1B वीजा पर बैन का विरोध करने वाले जो बाइडेन इसके भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन अब तक यह तय नहीं कर पाया है कि बैन जारी रखा जाए, या इसे खत्म किया जाए। एक हकीकत यह भी है कि अमेरिकी सरकार को इस बारे में कोई भी फैसला 31 मार्च के पहले लेना होगा, क्योंकि बैन की मियाद इस दिन खत्म हो जाएगी। इस वीजा कैटेगरी पर बैन पिछले साल 24 जून को लगाया गया। यह 31 दिसंबर था। 31 दिसंबर के पहले ही तब के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस बैन को 31 मार्च तक बढ़ा दिया था।

अफसरों को फैसले की जानकारी नहीं
सोमवार को होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी एलिजांद्रो मायोरकस से H-1B वीजा बैन के भविष्य पर सवाल पूछा गया। उन्होंने कहा- पहली प्राथमिकता लोगों को परेशानी से बचाना है। ट्रम्प के बाद बाइडेन ने मुस्लिम देशों के लोगों पर ट्रैवल बैन और ग्रीन कार्ड संबंधी कई ऑर्डर्स रद्द कर दिए। अब तक H-1B पर बैन को नहीं हटाया गया है। ये 31 मार्च को एक्सपायर हो जाएगा। राष्ट्रपति इस पर फैसला लेंगे। मैं वास्तव में नहीं जानता कि क्या होगा। सवाल पर सवाल पूछना ठीक नहीं है। हमें काफी काम करना है।

परेशानी की जड़ है सियासी फैसला
ट्रम्प ने जब H-1B पर बैन का फैसला किया था, तब इसकी सियासी वजह ज्यादा थी। नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव था। कोरोना के दौर में वहां बेरोजगारी बढ़ रही थी। ट्रम्प ने वोटरों को लुभाने के लिए H-1B पर बैन लगा दिया। कहा- हम सबसे पहले अमेरिकी लोगों को नौकरी देना चाहते हैं। यह देश अब ज्यादा विदेशी लोगों को नौकरी नहीं दे सकता।

फैसला नहीं, लेकिन प्रॉसेस जारी
H-1B पर भले ही बाइडेन ने कोई फैसला न लिया हो, लेकिन यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विस इसी साल 1 अक्टूबर 2021 से एप्लीकेशन एलोकेशन की प्रॉसेस शुरू करने जा रहा है। पिछले महीने उसने कहा था था कि वो 65 हजार पुराने आवेदनों की जांच कर रहा है। इनमें से 20 हजार एप्लीकेंट्स वे हैं जिन्होंने किसी अमेरिकी यूनिवर्सिटीज से ग्रेजुएशन किया है।

भारतीयों पर असर
31 मार्च को अगर H-1B वीजा पर बैन हटता है तो हजारों भारतीयों को अमेरिका में नौकरी मिलेगी यानी फायदा होगा। लेकिन, अगर सियासी या आर्थिक कारणों से यह बैन जारी रहता है तो इन लोगों का इंतजार बढ़ जाएगा। खासतौर पर IT प्रोफेशनल्स को दिक्कत होगी, क्योंकि इस वीजा कैटेगरी के चलते ही उन्हें अमेरिकी कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट बेस पर नौकरियां देती हैं।
ग्रीन कार्ड की बात करें तो अमेरिका में इस वक्त 4 लाख 73 हजार एप्लीकेशन पेंडिंग हैं। इसमें भी भारतीयों की संख्या काफी ज्यादा है।

इंतजार खत्म होगा या जारी रहेगा
2015 में भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लोगों की तादाद ने 10 लाख का आंकड़ा पार कर लिया था। इन लोगों से भारत को भारी रेमिंटंस का फायदा मिलता है। अमेरिकी सियासी गलियारों से लेकर व्हाइट हाउस की टीम में भी आज कई भारतीय-अमेरिकी हैं। पिछले साल अमेरिका में रहने के लिए 8 लाख लोगों को ग्रीन कार्ड मिलने का इंतजार था, ये अब तक जारी है।

पिचाई ने विरोध किया था
पिछले साल जब ट्रम्प ने पहली बार एच1बी वीजा पर रोक लगाई थी, तब गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। पिचाई ने सोशल मीडिया पर लिखा था- इमिग्रेशन की वजह से अमेरिका को बहुत फायदा हुआ है। इसकी वजह से ही वो वर्ल्ड लीडर बना। मैं प्रवासियों के साथ खड़ा हूं। उन्हें हर तरीके के मौके दिलाने की कोशिश करूंगा।

क्या है एच-1बी वीजा?
एच-1 बी वीजा गैर-प्रवासी वीजा है। अमेरिकी कंपनियां दूसरे देशों के टेक्निकल एक्सपर्ट्स नियुक्त करती हैं। नियुक्ति के बाद सरकार से इन लोगों के लिए एच-1बी वीजा मांगा जाता है। अमेरिका की ज्यादातर आईटी कंपनियां हर साल भारत और चीन जैसे देशों से लाखों कर्मचारियों की नियुक्ति इसी वीजा के जरिए करती हैं। नियम के अनुसार, अगर किसी एच-1बी वीजाधारक की कंपनी ने उसके साथ कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर लिया है, तो वीजा स्टेटस बनाए रखने के लिए उसे 60 दिनों में नई कंपनी में जॉब तलाशना होगा। भारतीय आईटी वर्कर्स इस 60 दिन की अवधि को बढ़ाकर 180 दिन करने की मांग कर रहे हैं। यूएस सिटीजनशिप एंड इमीग्रेशन सर्विसेज (यूएससीआईएस) के मुताबिक, एच-1बी वीजा से सबसे ज्यादा फायदा भारतीय नागरिकों को ही होता है।

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