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इंडियन एक्सप्रेस से साभार:​​​​​​​रिटायरमेंट से पहले वॉशिंगटन पोस्ट के एग्जीक्यूटिव एडिटर मार्टी बैरन ने इंडियन एक्सप्रेस के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनंत गोयनका को दिया इंटरव्यू

जाने-माने पत्रकार और वॉशिंगटन पोस्ट के एग्जीक्यूटिव एडिटर मार्टी बैरन रविवार यानी 28 फरवरी को रिटायर हो गए। उनसे बात की इंडियन एक्सप्रेस के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनंत गोयनका ने। इस ऑनलाइन वीडियो इंटरव्यू में बैरन ने सोशल मीडिया और सरकारों के टकराव से लेकर दुनियाभर के अखबारों के सामने मौजूद डिजिटल मीडिया की चुनौतियों के बारे में विस्तार से बताया।

अनंत गोयनका: सबसे पहले एक सफल और प्रभावशाली कार्यकाल के अंतिम दिन समय निकालकर हमसे बात करने के लिए आपका शुक्रिया।
मार्टी बैरन: जी बिल्कुल… मेरे कार्यकाल के दौरान एक के बाद एक ऐसी घटनाएं और खबरें हुईं, जिसकी वजह से यहां मेरा कैरियर काफी इवेंटफुल रहा। हाल ही में डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन से जुड़ी खबरें, उसके पहले नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी, एडवर्ड स्नोडेन डॉक्यूमेंट लीक केस, कैथोलिक चर्च इन्वेस्टिगेशन (2015 में मूवी स्पॉटलाइट की प्रेरणा इसी केस से मिली थी), 2000 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान फ्लोरिडा का विवाद हो या फिर 9/11 के साथ-साथ तमाम दुनिया में अमेरिकी सेना की कार्रवाई हो, वाकई मेरे कार्यकाल के दौरान काफी घटनाएं हुईं।

गोयनका: 2016 में जब एप्पल के CEO टिम कुक भारत आए थे, तब मैंने उनसे पूछा था कि एक भारतीय अखबार के थर्ड जेनरेशन के 29 वर्षीय प्रकाशक को आप क्या सलाह देंगे। तब कुक ने वॉशिंगटन पोस्ट का उदाहरण दिया था। 30 लाख सबस्क्राइबर्स के साथ आप पिछले 5 साल से लगातार फायदे में हैं। इसके लिए आप ट्रम्प को कितना श्रेय देंगे?
बैरन: पूरी तरह नहीं, लेकिन हां, कुछ हद तक आप उन्हें श्रेय दे सकते हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद लोगों में एक तरह की चिंता थी कि न जाने वो क्या करेंगे। हमें सतर्क रहने की जरुरत थी। तथ्यों के आधार पर हमने उनकी जिम्मेदारी तय करने की कोशिश की। लोगों की चिंता जायज थी कि अमेरिका की संवैधानिक संस्थाएं ट्रम्प को कटघरे में खड़ा करने में नाकाम होंगी। कांग्रेस पर ऐसा नहीं कर पा रही थी। जनता को ऐसा लग रहा था कि कोर्ट से भी कुछ नहीं हो सकता क्योंकि ट्रम्प ने कोर्ट में कई नियुक्ति अपनी पसंद से कर दी थीं। ऐसे में सबकी उम्मीदें प्रेस से थीं। मुझे लगता है कि शायद इसीलिए लोगों ने हमारा साथ दिया, उनकी उम्मीद पर खरा उतरना हमारा कर्तव्य था।

गोयनका: और शायद सरकार की खिलाफत निष्पक्ष पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण आधार माना जाता है…
बैरन: खिलाफत जैसी शब्दावली से मैं सहमत नहीं हूं लेकिन कई मर्तबा ऐसा हो जाता है। हम केवल अपना काम करते हैं। तथ्यों को इकट्ठा कर सही परिपेक्ष्य में पाठकों के सामने रखते हैं और उन्हें असलियत से रूबरू कराते हैं। सरकार और उससे जुड़े संस्थान इन सूचनाओं और तथ्यों को छुपाने की कोशिश कर रहे होते हैं। इस वजह से कई बार हम सरकार के खिलाफ खड़े नजर आते हैं।

कुछ सूचनाएं ऐसी होती हैं जिनकी जानकारी लोकतंत्र की प्रबुद्ध जनता को जानना जरूरी है। हम इन्हीं सूचनाओं-जानकारियों को जनता तक पहुंचाने का अपना काम कर रहे होते हैं। ऐसे में कई बार अनजाने में ही हम सरकार के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। जानबूझकर नहीं, बल्कि अपना काम करते हुए सरकार के विरोध में नजर आने लगते हैं।

गोयनका: ट्रम्प के 30,000 से ज्यादा झूठे और गलत बयानों का पर्दाफाश करने में वॉशिंगटन पोस्ट ने अहम भूमिका निभाई, इसके बावजूद राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प ने कड़ी टक्कर दी। क्या उनके इस प्रदर्शन से आपको हैरानी हुई?
बैरन: मुझे बिल्कुल भी हैरानी नहीं हुई। मैं जानता था कि ट्रम्प को जनता के समर्थन की कमी नहीं है। यह भी स्पष्ट था कि उनके समर्थक समाचार और सूचनाओं के लिए वॉशिंगटन पोस्ट, द न्यूयॉर्क टाइम्स या CNN या ऐसे किसी अन्य बड़े स्थापित मीडिया नेटवर्क पर निर्भर नहीं हैं। उनके समर्थक फॉक्स न्यूज, ब्रिटबार्ट और न्यूजमैक्स जैसे समाचार समूहों पर निर्भर थे। और ये सभी ट्रम्प प्रशासन के प्रवक्ता की तरह काम कर रहे थे।

वैचारिक तौर पर अमेरिका एक बंटा हुआ समाज है। हमें इस बात का इल्म है कि ट्रम्प को एक वर्ग से जबरदस्त समर्थन प्राप्त है और उनमें वोटरों को प्रभावित करने की शानदार क्षमता है।

गोयनका: ऐसा कोई विचार जिसे भारी जनसमर्थन न हासिल हो या फिर जो लोकप्रिय न हो उसे नकारने और अवैधानिक साबित करने की कुशलता दुनिया के दूसरे हिस्सा में भी देखने को मिलती है।
बैरन: यह बेहद डराने वाला है क्योंकि ट्रम्प के पहले चुनाव अभियान से ही यह स्पष्ट हो गया था कि वे प्रेस को झूठा साबित करेंगे.. प्रेस की विश्वसनीयता को खत्म कर देंगे। ट्रम्प जैसे नेता चाहते हैं कि उनके समर्थक केवल उसे ही सच मानें, जो वे खुद कहते हैं। उनके अलावा बाकी सब झूठे हैं।

मुझे यह मानने में कोई गुरेज नहीं कि ट्रम्प को कुछ हद तक इसमें सफलता मिल गई थी। उन्होंने हमारे जैसे मीडिया संस्थानों को जनता का दुश्मन करार दिया और हमारे लिए ‘देशद्रोही’ शब्द का इस्तेमाल किया। जनता को हमारे खिलाफ करने के लिए ट्रम्प ने खासी मेहनत की, जिससे लोगों का पत्रकारिता की मुख्यधारा से विश्वास उठ जाए और वो हमें पढ़ना या देखना ही बंद कर दें। ऐसा करने में कुछ हद तक उन्हें सफलता भी मिली थी। यही हम दूसरे देशों में भी देख रहे हैं। वो दुनिया के दूसरे देशों और नेताओं के लिए उदाहरण हो सकते हैं।

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