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लेखक से जानिए वेब सीरीज की कहानी: 'चौरासी' के दंगों से जुड़े सच की तलाश है 'ग्रहण'

लेखक से जानिए वेब सीरीज की कहानी: 'चौरासी' के दंगों से जुड़े सच की तलाश है 'ग्रहण'

निमिषा श्रीवास्तव/नई दिल्ली: हिंदी वेब सीरीज़ अक्सर महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दों को उठा कर ऑडिएंस के सामने रखती है और इसी के साथ कुछ पुराने हमारी सोच को एक नया दायरा देती है. ऐसी ही एक वेब सीरीज़ Disney+Hotstar पर 24 जून को रिलीज हुई और तुरंत ही चर्चा में आ गई. यह सीरीज़ है रंजन चंदेल द्वारा निर्देशित ‘ग्रहण’ (Grahan).

ग्रहण साल 1984 में बोकारों में हुए सिख-विरोधी दंगों पर के इर्द-गिर्द बनी हुई है. बता दें, ग्रहण के ट्रेलर को भी लोगों ने पसंद किया था और इसके रिलीज़ होने के बाद भी इसे काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला है. लोग में इस सीरीज़ को लेकर इसलिए भी एक्साइटेड हैं, क्योंकि इसकी कहानी नॉवेल ‘चौरासी’ से प्रेरित है. फेमस राइटर सत्य व्यास द्वारा लिखी गई ये नॉवेल 2018 में पब्लिश हुई थी और उसे भी जनता ने खूब सराहा था. 

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कालाकार जोया हुसैन, पवन मल्होत्रा, अंशुमन पुष्कर, वमिका गब्बी ने ‘चौरासी’ के किरदारों को पन्नों से निकालकर हमारी आंखों के सामने रख दिया. बोकारो, झारखंड के लेखक सत्य व्यास ने ‘चौरासी’ के अलावा हमें और भी नॉवेल दी हैं. बनारस टॉकीज़ (2015), दिल्ली दरबार (2016), बागी बलिया (2019) और उफ्फ कोलकाता (2020) ने भी जनता के दिलों में घर बना लिया. आइए उन्हीं से जानते हैं कि ‘ग्रहण’ का किताब से स्क्रीन तक का सफर कैसा रहा. 

‘ग्रहण’ सीरीज़ ‘चौरासी’ से इंस्पायर्ड है, लेकिन चौरासी लिखने की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
इसके जवाब में सत्य व्यास ने बताया कि ‘चौरासी’ उस दुख से इंस्पारयर्ड है, जो पिछले 30 से भी ज्यादा सालों से सिख समुदाय के ज़हन में मौजूद. उस अन्याय से इंस्पायर्ड है, जो सिख को सहन करना पड़ रहा है. आप मान लीजिए कि यह उनकी भावनाओं का एक संग्रह है. ‘चौरासी’ एक ऐसी फिक्शनल कहानी है, जो सिखों के असल दुखों से प्रेरित है.

क्या आपको लगता है ‘ग्रहण’ सीरीज ‘चौरासी’ की कहानी को बखूबी समझा पाई है?
सत्य व्यास ने बताया कि ग्रहण ने किताब की असल भावनाओं को बखूबी प्रदर्शित किया है. ज्यादातर देखा जाता है कि जब भी किसी किताब पर कोई फिल्म या सीरीज़ बनती है तो, किताब में लिखी असल कहानी शायद कहीं खो जाती है. कई बार ऐसा भी होता है कि जो चीजें पन्ने पर लिखी होती है, वह कैमरा में वैसी नहीं दिखतीं, जैसा एक लेखक सोचता है. लेकिन सत्य व्यास अपने आप को खुशनसीब समझते हैं कि ‘चौरासी’ के साथ ऐसा नहीं हुआ है कि जो भी हिस्सा या संवाद सीरीज़ में लिया गया, वह हूबहू, बिल्कुल वैसे ही हैं और उतना ही प्रभाव डालते हैं.

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आप इस तरह भी सोच सकते हैं कि जब एक लेखक किताब लिखता है, तो उसके पास स्वछंद अधिकार होता है, वह कुछ भी लिख सकता है. कहानी पर उसका नियंत्रण होता है. लेकिन जब आप उसपर सीरीज़ बनाने लगते हैं तो वह किसी एक व्यक्ति के नियंत्रण की बात नहीं होती है. फिर सिर्फ वही चुना जाता है जो उस सीरीज़ या फिल्म के लिए अच्छा हो. 

इस सीरीज के नाम (ग्रहण) की क्या कहानी है?
इसपर सत्य व्यास ने बताया कि सीरीज़ का नामकरण किया गया, तो दो-तीन बातें ध्यान में रखी गईं-
पहला तो यह कि जो नाम हमें पसंद है या जो नाम असल किताब का है, जरूरी नहीं कि उसके राइट्स भी मिल जाएं. फिल्म या OTT (Over the Top) सीरीज के राइट्स काफी समय पहले से रजिस्टर कराने होते हैं. ऐसे में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि शायद रजिस्ट्रेशन के दौरान ‘चौरासी’ नाम न मिल सका हो.
दूसरा, ‘ग्रहण’ नाम रखने की मंशा यह है कि इतने सालों से सिख समुदाय जो झेल रहा है, माना जा सकता है कि इंसाफ के ऊपर एक ‘ग्रहण’ लगा है. यह सीरीज़ उसी को दर्शाती है. जो उनके साथ अनियमितताएं हुईं, जो अन्याय हुआ, हम उस ग्रहण की बात कर रहे हैं.
तीसरा, ‘चौरासी’ किताब की तरह ही ‘ग्रहण’ सीरीज इस बात को दर्शाती है कि हर ग्रहण के बाद एक रोशनी जरूर आती है. इसे एक सकारात्मकता के तौर पर देखा जा सकता है कि ‘ग्रहण’ आया है तो इसी के बाद एक उम्मीदों की और इंसाफ की रोशनी भी आएगी. 

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शूटिंग के दौरान आपका एक्सपीरिएंस कैसा रहा?
राइटर सत्य व्यास ने बताया कि शूटिंग के दौरान मामला यह रहा कि कोरोना की वजह से ट्रेवल करना मुश्किल हो गया था. इसलिए शूटिंग तो उन्होंने मिस कर दी. हालांकि, दूरी महज़ शहरों की थी, क्योंकि वे हमेशा ही फोन और टेक्नोलॉजी से डायरेक्टर और सीरीज़ से जुड़े लोगों से कनेक्टेड रहते थे. जब भी कहानी या किसी और चीज को भी लेकर डायरेक्टर के मन में कोई सवाल होता था या कोई राय लेनी होती थी, तो सत्य व्यास सिर्फ एक फोन की दूरी पर ही रहते थे.

चौरासी की कहानी से आपको जुड़ाव क्यों महसूस हुआ?
दरअसल, सत्य व्यास बोकारो शहर, झारखंड के रहने वाले हैं. 1984 दंगों के बाद नानावती कमीशन की रिपोर्ट में भी यह बात कही गई थी कि दिल्ली और कानपुर के बाद सबसे ज्यादा दुर्व्यवहार और हत्याएं बोकारे में ही हुई थीं. तब सत्य प्रकाश 3 या 4 साल के रहे होंगे. इसलिए लाजमी था कि उन्हें इस हिंसा से जुड़ी ज्यादा बातें याद नहीं रहीं. लेकिन जब वह बड़े होने लगे तो उन्होंने एक दफा रेडियो पर सुना कि देशभर में बोकारो दो बार चर्चा का विषय बना. एक बार तब जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फावड़ा चला कर वहां स्टील प्लांट की स्थापना की और दूसरी बार तब जब इंदिरा गांधी की मृत्यु हुई. 

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रेडियो पर सुनी वह बात सत्य व्यास के दिमाग में घर कर गई. उन्होंने सोचा कि बोकारो जैसा शांतिप्रिय शहर, वह शहर जहां हर कोई एक दूसरे को समझता है, उसे देशभर में नरसंहार के लिए याद किया जाए. यह बात उन्हें खटकती थी. यह हिंसा कुछ लोगों की गलती हो सकती है, कुछ लोगों ने शायद अपने फायदे के लिए गलत किया हो. लेकिन उनकी वजह से पूरे शहर के साथ गलत नहीं होना चाहिए. सत्य व्यास का कहना था कि उनके शहर बोकारो का उनपर एक ऋण था, जिसे वे चुकाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने इस कहानी को चुना.

क्या आपने फैंस के लिए कोई नई किताब लिख रहे हैं?
फैंस के लिए एक खुशखबरी है. मीना कुमार पर सत्य प्रकाश एक बायोग्राफी लिख रहे हैं, जो जल्द ही पब्लिश होगी. यह एक नॉन-फिक्शन है. इसके अलावा, वह दो और कहानियों पर काम कर रहे हैं, जिसके लिए अभी हमें करीब एक साल का इंतजार करना पड़ेगा.

आपको अपने द्वारा लिखी किस कहानी से सबसे ज्यादा लगाव है?
इस सवाल सत्य व्यास के लिए थोड़ा मुश्किल था, क्योंकि जाहिर है कि एक लेखक के लिए उसकी हर कहानी एक विशेष महत्व रखती है. सारी सत्य प्रकाश ने कहा कि दिल्ली दरबार (2016), उनकी दूसरी किताब है जो उन्हें बहुत प्यारी है. क्योंकि बनारस टॉकीज़ एक ऐसी किताब में कुछ ऐसी घटनाओं का वर्णन था, जो उनके जीवन में घटित हुई हों. उसमें लिखने के लिहाज से उनके पास बहुत कुछ नहीं था. लेकिन जब उन्होंने दूसरी किताब पर काम करना शुरू किया, तो उन्हें महसूस हुआ कि उनके अंदर एक लेखक सामने आया. 

किसी भी व्यक्ति के लिए एक कहानी लिखना आसान हो सकता है, क्योंकि उसे कई सालों की सोच से पिरोया जा सकता है. लेकिन, सत्य व्यास अक्सर लोगों से बोलते हैं कि तुम लेखक बनने का तब सोचो, जब तुम्हारे पास दूसरी कहानी हो. दिल्ली दरबार वही कहानी थी, जिससे उन्हें महसूस हुआ कि वह एक लेखक हैं. 

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सीरीज़ बनाने के लिए ‘चौरासी’ को कैसे चुना गया?
सत्य प्रकाश ने बाताया कि अभी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के साथ पूरा विश्व ही अच्छे कंटेंट की तलाश कर रहा है. लेकिन सच्चाई यह है कि इंडस्ट्री में कंटेंट की भारी कमी है. वहीं, OTT प्लेटफॉर्म आने के बाद कहानियों की मारामारी शुरू हो गई. प्रोड्यूसर या स्क्रीन प्ले राइटर्स अब अंग्रेजी किताबों के अलावा भी किसी और सोर्स से भी कंटेंट ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं.

दूसरी बात यह कि, MAMI Word to Screen Festival, जो मुंबई में आयोजित किया जाता है, इसमें कई लेखक अपनी कहानी सबमिट करते हैं और फिर प्रोड्यूसर्स को अगर कहानी दिलचस्प लगे तो उसपर सीरीज़ या फिल्म बनाने के लिए लेखक से संपर्क करते हैं. ‘चौरासी’ उस फेस्टिवल के लिए सेलेक्ट की गई थी. इसके बाद कुछ प्रोड्यूसर्स ने सत्य व्यास से कॉन्टैक्ट किया. 

इसके अलावा, फिल्म इंडस्ट्री हमेशा ही नई कहानियों पर नजर रखती है और पसंद आने पर उसे झट से उठा लेती है. क्योंकि अच्छे कंटेंट को कोई भी प्रोड्यूसर छोड़ना नहीं चाहता.

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क्या ‘ग्रहण’ और ‘चौरासी’ के किरदार मेल खाते हैं?
इस सवाल पर सत्य व्यास ने बताया कि कोई भी किताब आपको एक फिल्म के लिए डेढ़ से दो घंटे का मटीरियल दे सकती है. लेकिन वेब सीरीज़ में आपको तकरीब 8-10 घंटे का कंटेंट चाहिए होता है. अब इसके लिए ज्यादातर नए कैरेक्टर जोड़े जाते हैं या नई कहानी जोड़नी पड़ती है. ‘ग्रहण’ के साथ भी ऐसा ही है. यह सीरीज़ दो भागों में चलती है. एक कहानी 1984 की कहानी दर्शाती है और दूसरी 2016 की. सत्य व्यास ने बताया कि 2016 की कहानी के किरदार उनके नहीं हैं, वह स्क्रीन-प्ले राइटर्स की मेहनत है. लेकिन 1984 का हर किरदार वैसा ही है, जैसे सत्य ने अपनी किताब में पिरोये हैं.

जरूर देखें यह कहानी
इसी के साथ सत्य व्यास ने कहा है कि सभी को ‘ग्रहण’ जरूर देखनी चाहिए. इसलिए नहीं, क्योंकि यह ‘चौरासी’ पर बनी है, लेकिन इसलिए, क्योंकि वह मानते हैं कि यह एक ऐसी कहानी है, जो बहुत साल तक लोगों के ज़हन में रहेगी.

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