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Shahjahanpur की 'जूता मार’ होली के लिए प्रशासन पूरी मुस्तैदी से जुटा, जानिए कैसे हुई थी शुरुआत

शाहजहांपुर: जिस तरह उत्तर प्रदेश (UP) के मथुरा (Mathura) के बरसाना और नंदगांव की ‘लट्ठमार होली’ (Lathmar Holi) दुनिया भर में मशहूर है, उसी तरह शाहजहांपुर (Shahjahanpur) जिले में हर साल होली के दिन खेली जाने वाली ‘जूता मार होली’ (Juta Maar Holi) की भी एक अलग पहचान है. इसकी तैयारी में पुलिस प्रशासन पूरी मुस्तैदी से जुट गया है. आयोजकों के मुताबिक इस बार ‘लाट साहब’ दिल्ली (Delhi) से आएंगे जबकि पिछली बार ‘लाट साहब’ रामपुर से लाए गए थे. होली के दिन भैंसा गाड़ी पर निकलने वाले जुलूस में ‘लाट साहब’ मुख्‍य आकर्षण होते हैं.

डीएम-एसपी ने संभाला मोर्चा

जिले के अपर पुलिस महानिदेशक अविनाश चन्द ने बताया कि बुधवार रात जिलाधिकारी तथा पुलिस अधीक्षक के अलावा बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ ‘लाट साहब’ के जुलूस के मार्ग पर फ्लैग मार्च हुआ था. वहीं पुलिस अधीक्षक एस आनंद के मुताबिक इस बार होली पर निकलने वाले छोटे तथा बड़े लाट साहब के जुलूस के लिए प्रशासन की तरफ से 5 पुलिस क्षेत्राधिकारी, 30 थाना प्रभारी तथा 150 उपनिरीक्षक, 900 सिपाहियों के अलावा 2 कंपनी पीएसी (PAC) तथा 2 कंपनी आरपीएफ (RPF) तथा 2 ड्रोन कैमरों की मांग भी की गई है. प्रशासन के मुताबिक इतना इंतजाम 25 मार्च तक पूरा हो जाएगा.

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इस तरह मनाई जाती है ‘जूता मार’ होली

स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ विकास खुराना के मुताबिक ‘यहां होली वाले दिन ‘लाट साहब’ का जुलूस निकलता है और उन्हें भैंसा गाड़ी पर तख्त डालकर बिठाया जाता है. लाट साहब का जुलूस बड़े ही गाजे-बाजे के साथ निकलता है और इस दौरान लाट साहब की जय बोलते हुए होरियारे उन्हें जूतों से मारते हैं.’

‘1827 में इस तरह हुई शुरुआत’

डॉ खुराना ने बताया, ‘शाहजहांपुर शहर की स्थापना करने वाले नवाब बहादुर खान के वंश के आखिरी शासक नवाब अब्दुल्ला खान पारिवारिक लड़ाई के चलते फर्रुखाबाद चले गए. इसके बाद वो साल 1729 में 21 वर्ष की उम्र में वापस लौटे. वह हिंदू-मुसलमानों के बड़े प्रिय थे इसी बीच होली का त्यौहार आ गया तो दोनों समुदाय के लोग उनसे मिलने के लिए घर के बाहर खड़े हो गए. नवाब साहब बाहर आए तो लोगों ने होली खेली. उसके बाद में उन्हें ऊंट पर बैठाकर शहर का एक चक्कर लगवाया गया इसके बाद से यह परंपरा बन गई.’

‘लाट साहब’ के जुलूस की कहानी

जिले के लोग बताते हैं कि साल 1857 तक हिंदू- मुस्लिम दोनों मिलकर यहां बड़ी धूमधाम से होली मनाते थे. नवाब साहब को हाथी या घोड़े पर बैठा कर घुमाया जाता था लेकिन हिंदू-मुस्लिम का प्यार और भाईचारा अंग्रेजों को रास नहीं आया. इसके बाद 1947 में नवाब साहब के जुलूस का नाम बदल कर प्रशासन ने ‘लाट साहब’ कर दिया और तब से यह लाट साहब के नाम से जाना जाने लगा. इसी दौरान अंग्रेज यहां से चले गए और फिर अंग्रेजों के प्रति लोगों में जो आक्रोश था उससे ही इस नवाब के जुलूस का रूप विकृत हो गया था.

सिविल सेवा परीक्षा से जुड़ा रोचक तथ्य

लाट साहब का यह जुलूस चौक कोतवाली स्थित फूलमती देवी मंदिर से निकलता है और वहां लाट साहब मंदिर में माथा टेकते हैं तथा पूजा अर्चना करते हैं. इसके बाद कोतवाली में सलामी लेते हुए बाबा विश्वनाथ मंदिर में पहुंचते हैं और फिर ये जुलूस चौक लौटकर समाप्त हो जाता है. इतिहासकार डॉ खुराना ने यह भी दावा किया कि सिविल सर्विस के प्रशिक्षण के दौरान लाट साहब का यह जुलूस पाठ्यक्रम का हिस्सा है तथा कई बार इस जुलूस के समय प्रशिक्षु आईएएस को मौके पर भेजा गया था.

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