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गांधी परिवार का अस्तित्व खतरे में! क्या कांग्रेस के हाथों से फिसल जाएगा UPA का नेतृत्व

कांग्रेस पार्टी की लगातार गिरती लोकप्रियता से ना सिर्फ पार्टी के अन्दर लोग बेचैन हैं, बल्कि इसका साफ़-साफ़ असर अब कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाएंस (UPA) पर भी दिखने लगा है. यूपीए में फिलहाल 11 दल शामिल हैं जिसमे नौ क्षेत्रीय दल, कांग्रेस और एनसीपी दो राष्ट्रीय दल शामिल हैं.

क्या भारतीय राजनीति (Indian Politics) में गांधी परिवार (Gandhi Family) का अस्तित्व खतरे में है? यह प्रश्न इसलिए क्योंकि न सिर्फ कांग्रेस पार्टी बल्कि यूपीए (UPA) में भी गांधी परिवार के खिलाफ सुगबुगाहट शुरू हो गयी है. गांधी परिवार के खिलाफ कांग्रेस पार्टी (Congress Party) में मोर्चाबंदी शुरू हो चुकी है. पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का गुट जिसे G-23 के नाम से जाना जाता है, अब 2 मई की प्रतीक्षा में हैं जिस दिन पांच प्रदेशों में हो रहे विधानसभा चुनाव परिणाम (Assembly Election Result) घोषित होगें. कांग्रेस पार्टी के अन्दर के लोग हों या बाहर के, सभी यह मान कर चल रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहने वाला है.

पार्टी को केरल से उम्मीद थी पर ओपिनियन पोल्स (Opinion Polls) में यह बात सामने आ रही है कि वाम दलों की लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानि LDF शायद सत्ता बचाने में सफल हो जाए. अगर ऐसा होता है तो केरल के इतिहास में चालीस साल बाद पहली बार किसी गठबंधन की लगातार दूसरी बार सरकार बनेगी. प्रदेश में LDF और कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली UDF की बार-बारी से सरकार बनती रही है.

आगामी चुनावों में कांग्रेस का होने वाला है बुरा हाल?

अगर कुछ अप्रत्याशित ना हो तो यह मान कर चलना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी का एक बार फिर से बद से बदतर स्थिति की तरफ अग्रसर दिखेगी. G-23 के नेताओं को इसी समय का बेसब्री से इंतजार है ताकि वह गांधी परिवार के खिलाफ खुल कर सामने आ सकें और पार्टी हित में कांग्रेस पार्टी को गांधी परिवार से मुक्ति की बात कर सकें. जून के महीने में कांग्रेस पार्टी के नए अध्यक्ष का चुनाव होने की सम्भावना है, ऐसा प्रतीत होता है कि इसबार पार्टी अध्यक्ष पद के लिए संघर्ष और चुनाव दोनों हो सकता है.

गांधी परिवार के हाथ से फिसल जाएगी UPA की चाबी

कांग्रेस पार्टी की लगातार गिरती लोकप्रियता से ना सिर्फ पार्टी के अन्दर लोग बेचैन हैं, बल्कि इसका साफ़-साफ़ असर अब कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाएंस (UPA) पर भी दिखने लगा है. यूपीए में फिलहाल 11 दल शामिल हैं, जिसमे नौ क्षेत्रीय दल और कांग्रेस तथा एनसीपी दो राष्ट्रीय दल शामिल हैं. शिव सेना को यूपीए के बारहवें घटक दल के रूप में गिना जा सकता है. कांग्रेस और एनसीपी महाराष्ट्र में शिव सेना के नेतृत्व वाली सरकार का हिस्सा हैं, पर शिव सेना अभी तक औपचारिक तौर पर यूपीए में शामिल नहीं हुई है.

पिछले 17 वर्षों से सोनिया गांधी हैं UPA अध्यक्ष

सभी क्षेत्रीय दलों की इच्छा होती है कि केंद्र की सरकार में भी उनका प्रतिनिधित्व हो, यानी कहीं ना कहीं यूपीए के घटक दलों का भविष्य भी कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़ा हुआ है. चूंकि कांग्रेस पार्टी की नाव डगमगाती दिख रही है, इस कारण क्षेत्रीय दलों की बेचैनी भी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. यूपीए की अध्यक्ष पिछले सत्रह वर्षों से सोनिया गांधी हैं. वह उस समय भी यूपीए अध्यक्ष थीं जबकि उन्होंने दो सालों के लिए कांग्रेस अध्यक्ष का पद अपने पुत्र राहुल गांधी को सौंप दिया था.

कांग्रेस पार्टी और यूपीए की स्थिति कहीं ना कहीं सोनिया गांधी के स्वास्थ से जुड़ा हुआ है. पिछले कई सालों से सोनिया गांधी स्वास्थ कारणों से राजनीति में सक्रिय नहीं है. कई दलों का मानना है कि केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए के खिलाफ जिस सशक्त विपक्ष की ज़रुरत है उसे नेतृत्व देने में गांधी परिवार अब सक्षम नहीं रहा है.

शरद पवार को मिल सकती है UPA अध्यक्ष की गद्दी

शिव सेना की तरफ से अब मांग आई है कि समय हो चला है कि सोनिया गांधी यूपीए अध्यक्ष पद का त्याग कर दें और एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार को यह पद सौंप दें. सिवा इसके की कांग्रेस के बाद यूपीए में एनसीपी ही सबसे बड़ी दूसरी पार्टी है, शरद पवार में ही यह क्षमता है कि वह यूपीए में नई जान फूंक सकें और इसका विस्तार कर सकें. पवार को केंद्र की राजनीति का लम्बा अनुभव है और सभी दलों में उनकी पैठ है.

एनडीए के कई घटक दल बीजेपी से नाखुश हैं और कई ऐसे क्षेत्रीय दल हैं जो ना तो एनडीए का हिस्सा हैं और ना ही यूपीए का. अगर पवार को यूपीए की कमान सौंप दी जाती है तो यह संभव है कि वह कई क्षेत्रीय दलों को यूपीए के साथ जोड़ने में सफल हो सकें और 2024 के आम चुनाव में एनडीए के विरुद्ध एक सशक्त विकल्प देश के सामने रख सकें.

जून का चुनाव गांधी परिवार के लिए चुनौती पूर्ण

लेकिन सवाल यही है कि क्या गांधी परिवार इसके लिए तैयार है? शायद नहीं. क्योकि इसका सीधा मतलब होगा कि 2024 के आम चुनाव में राहुल गांधी यूपीए की तरफ से एक बार फिर से प्रधानमंत्री पद के लिए नामित नहीं हो पाएंगे. सोनिया गांधी का पुत्रमोह और उसके कारण कांग्रेस पार्टी की दुर्गति से सभी वाकिफ हैं. सीधे शब्दों में कहा जाए तो गांधी परिवार अंतिम सांस तक कांग्रेस पार्टी और यूपीए पर अपनी पकड़ बनाये रखने की हर संभव कोशिश करेगी.

इस बात की सम्भावना प्रबल होती जा रही है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में यूपीए के अन्य घटक दल भी रूचि ले सकते हैं. गांधी परिवार को अध्यक्ष पद पर जो भी चुनौती दे यूपीए के अन्य घटक दल पर्दे के पीछे से उसका प्रचार और समर्थन कर सकते हैं, ताकि यूपीए 2024 में फिर से केंद्र में सत्ता पाने का सपना देख सके. अगर पांच प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा, जैसा की अनुमान है, तो ऐसा लगने लगा है कि आने वाला तीन-चार महीना गांधी परिवार के लिए काफी चुनौतीपूर्ण साबित होने वाला है.

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